Wednesday, February 20, 2013

O' KUNDERA


How could I never touch you? Feel you? See you? Before… How could I miss you? I cannot believe I have never known you. You said it. At last. And you said it so easily. With such grace. Without élan. How could you Kundera? Is it so light? Really? Removing clothes? Untagging? Unlabelling? Feeling…simply feeling. The body enmeshed in soul. The skin soaked in delight. The eyes choked with radiance. Without burden? Without load? Of morality? Righteousness? Discrimination? Was it simple? Undemanding? Painless? I can imagine it would have hurt a lot. You must have died many a times. Scorched. Cursed and stoned to death. But you finally resurrected. Transformed. Your wounds. Your pains. And nailed it. I too always thought so. But was also afraid to lead. Life is light. You said it. And your reference has given me the weight. To admit it. Say it. Do it. It’s unbearable. I know. The weight of lightness. Especially in the beginning when you are naked. For the first time. Before the entire world draped in layers and layers of conflicts. Battles. Wars. Without conclusion. Without liberation. It’s difficult to meet. Initially. Connect. With others. Without relation. Familiarity. Future. And gender too. But it’s beautiful. Indeed. How could we never construct? A world in a world in a world. Millions of them. Merging and losing in each other. But still remaining intact. Free. Legal. You were so fucking right, Kundera. Let me tell you that I loved the whole of it. And I loved the aftermath too. The woods. The rural way. And simple labor. You even made me cry in the end. When Karenina dies a merciful death. When Tereza dances in the bar. With a glow in her eyes. Without fears. Without strings. When Tomas says I m happy. And everything vanishes forever. Into lightness. The unbearable one. Of being. Thank you Kundera for enriching me. Enlightening me. Supporting me. I shall always be grateful. Love you. 

Saturday, February 16, 2013

इंतज़ार

एक चाँद
काटा था
उस रात
तुम्हारे जन्मदिन पर
सोचा
आधा आधा
खायेंगे
रात बीत गयी
तारों ने की
शिकायत
पर तुम
वादा भूल गयी
आ जाओ
एक दिन
पूरी कर दो
हसरत

चाँद
बेचारा
आधा सा
आज भी आधा पड़ा
है
तुम्हारे इंतज़ार में।।। 

DAAYARA AUR DEHLEEZ


MORTALS


As mortals
We grow
Eat
Drink
And die
As mortals
We walk
Run
Fall
And cry
At the end
We remain
Mortals
Measly mortals
Let’s love
Kiss
Merge
And stride
Let’s vanish
As immortals
Beyond
Birth
Death
Existence
Non-existence
Into a timeless
Spaceless
Unified
Reality…
 

Wednesday, February 6, 2013

श्रुति।।। स्मृति।।। साधना।।।


श्रुति।।।
व्यापार 
लेन देन 
उपस्थिति 
आसन 
आधार
देह 
पुरुष 
प्राण 
साधू 
श्रवण 
व्यक्ति 
पूजा
भक्ति 
रस्म 
सत्संग 
शब्द 
आनंद  
जाग्रत 
उन्स 
पृथ्वी।।।

स्मृति।।।
ध्यान 
मिलन 
प्रेम 
विवाह 
बंधन 
अनुभव 
देह-बुद्धि 
जाग्रत-सुषुप्ति 
अर्थ 
व्यक्त 
मानस 
मनन 
नृत्य 
सिद्धि 
संस्कार 
स्मरण 
समर्पण  
सिमरन 
नेती नेती 
सोऽहं 
संकल्प 
विवेक 
वैराग्य 
आकाश 
चिदानन्द 
चिदाकाश।।। 

साधना।।।
परिवर्तन 
आगमन 
इश्क 
सम्भोग 
स्वपन 
लीला 
दर्शन 
संन्यास 
त्याग 
मुक्ति 
कल्याण
प्रकृति 
प्रलय 
नटराज 
ताण्डव 
अव्यक्त 
आत्म-प्रकाश 
परमाकाश 
सद्चितानन्द 
महादकाश 
महा-मृत्यु 
महा-सत्तव 
महा-तत्व 
पारब्रह्म 
ब्रह्मचर्य 
स्वर्ग 
शून्य 
तुरिया 
योगी 
यज्ञ 
मोक्ष 
निरवाना 
सत्यम 
शिवम् 
सुंदरम।।।
 

किरदार


कई आहें भरता हूँ 
कई सांसें लेता हूँ 
हर रोज़।
रोज़ स्क्रिप्ट के पन्नों पर 
खींचा ताना जाता हूँ 
पेंसिल से।
एक कल्पना हूँ।
लेखक के कैनवस पर 
खिंची एक लकीर। 
बाकी सभी लकीरों 
जैसी। 
ज़रूरी पर 
मामूली भी। 
इंसान जैसी 
पर 
जीवन से छोटी। 
जीती जागती
मर जाने वाली।   
फिल्म के रील जैसी 
काली धुंधली 
पर इतिहास समेटे 
अंधेरी दलीलों में।
एक सत्य कहानी 
पर रहस्य जैसी। 


कई कॉस्टूम बदलता हूँ 
कई चेहरे पेहेनता हूँ 
हर रोज़।
ना शब्द मेरे 
ना दास्ताँ मेरी 
और ना ही रिश्ते नाते।
ना बिछुए मेरे 
ना कंगन मेरे 
और ना ही तख़्त ताबीज़। 
ना आज़ान मेरी 
ना अंत मेरा 
और ना ही भूत भविष्य। 
मैं तो ज़रिया हूँ 
केवल।
और कुछ नहीं 
कुछ भी नहीं।
देखा है 
अक्सर 
एक कोने में  
आधे अधूरे 
सियाही से सने 
पन्नों को 
कई अपने जैसे 
किरदार समेटे 
किस्मत की उड़ान 
भरते 
बीच कहीं 
निराश हो जाते हैं। 
कौन समझाए 
पगलों को 
नादां बेचारे। 
मौत ही तो सत्य है 
पारब्रह्म। 
सद्चितानन्द।।।  


कई  बार जी चुका  हूँ 
मर चुका हूँ 
कितने ही जीवन। 
यह बूढ़ा स्टूडियो 
प्रमाण है 
मेरी गवाही का। 
मेरे साथ
यह भी तय करता आया है 
अब तक 
इस सफ़र को। 
कितनी बार रोंदा गया 
कुचला गया 
कभी फूलों से नवाज़ा 
गया। 
याद नहीं 
भूल गया हूँ 
सब हिसाब। 
क्या घटा 
जुड़ा
क्या गुणा 
तकसीम हुआ। 
एक अरसा लगता है 
बीत गया
शायद। 
बूढ़ा हो गया हूँ 
अब।
कौन हूँ मैं 
यह जान लूं तो 
मर  सकता हूँ  
बेफ़िक्री से। 
इस पन्नों की ढेरी 
से 
मुझे मेरा किरदार 
लौटा दो। 
और इस किरदारों की बस्ती 
से 
मुझे मेरा अक्स 
लौटा दो। 
फिर ओढ़ा के मुझ पे 
मेरा अपना शरीर
विदा करो 
मुझे रिहा करो।।।

Tuesday, February 5, 2013

DARMIYAAN


मलहम

चाँद 
आधा सा
थका सा
लग रहा है
आज
दिन भर की गर्मी से
थपेड़ों से
बीमार पड़ गया है
शायद
छत की तलाश में
उदास
हताश
मुरझा गया है
नादान 
शरीर ठंडा पड़ा है
जैसे मर गया हो कोई
सुनसान
बीयाबान
जा कर सो जाओ
उसके साथ 
आबाद कर दो
सहमा बदन
मलहम भर देना
ज़ख्मों में
बातें करना
मीठी मीठी
मिसरी वाली
चटपटी
करारी
अपनी साँसों से
सहला देना बालों को
सूख गए हैं
रूखे रूखे
बेजान
लोरी सुनाना
नानी वाली
परियों और तारों
वाली
जब सो जाए तो ढक देना
कम्बल से
अच्छी तरह
फिर बत्ती बुझा के
आ जाना वापस

आखिर सुबह
फिर काम पे भी तो जाना है
दोबारा।।।

Sunday, February 3, 2013

आगाज़


मेरे हाथ की लकीरें
धुंधली सी
उधड़ सी गयी हैं 
वक़्त के इस शोर में
कहीं  से आ कर
लिख दो इन पर
एक कहानी
बुन दो नए किस्से
उमंग भरे
रंग दो नयी तकदीर
सपनों भरी
बिखेर दो नए शब्द
जिनसे निकले
तो एक दास्ताँ निकले
उजली सुर्ख लाल
फलसफों वाली

ऐसे होगा
हाँ ऐसे ही होगा
इश्क का नया 
आगाज़।।।

उम्मीद



सुबह से आँख फड़क रही थी
अम्मी कहती है
किसी के आने का इशारा होती है
खुश थी
उम्मीद उगी थी
आँगन में 
कई बरस बाद
मन  बहका
नयी पोशाक पहनी
ज़री जड़े  फूलों वाली
मेहंदी रचवाई
हाथों में
नाम गुदवाया उनका
उसमे
उलझी हुई लकीरों में
छोटा छोटा
ठण्डी अंगीठी में
कोयला डाला
तकदीर झोंकी चूल्हे में
उजड़ी हुई
बंजर बेजान
सरसों का साग बनाया
अब्बा बाज़ार से आटा ले आये
मक्की का
तभी अजीब सा शोर सुना
जैसे कोई गुल्लक फूटी हो
सपनों वाली
बाहर जाके देखा तो
खेत में आग लगी थी 
रेडियो वाले बोले
ज़ाहिर की  मौत हो गयी
एक प्लेन क्रैश में ...

DAMAN


Friday, February 1, 2013