Wednesday, July 9, 2008

this is the end...

the words stare at me
motionless;
the thoughts wait for freedom
helpless.

white pages lie ruffled on
the road;
dead corpses get crampled
and cold.

the sense is burning
in the fire of more;
the race has long started
with a purpose to explore .

the vision is scarred
the inspiration too marred;
yet a desire to conquer
survives the war.

we don't know our enemies
nor the reason to be so sore;
we don't see the light
that shines through the door.

the throats don't creak
as the swords touch the bone;
the blood doesn't gush
when the ego gets a stone.

the clock stands still
with hour hand at thirteen;
the ink has dried up and
the words have lost their sheen.

the mud is dark
and the light too dim;
the trench is deep
and the hope so thin.

morrison says that this is the end
but the story ended long ago;
the sun always shines for us
but the truth remains
that we died long before...

द्वंद्व

लहरों पे चलने की कोशिश करती एक कश्ती
और दो किनारों का अंतर्द्वंद्व l
हर पल हरदम हिम्मत जुटाता अकेला माझी
कश्ती पार लगाने को
और अभिमान में जलते दो किनारों का अंतर्द्वंद्व l
कभी कश्ती को डुबाता एक किनारा तो
कभी सहारा देता दूसरे का हाथ l
एक पल ठोकरें खाता माझी तो
दूसरे पल हवा के साथ बातें करता उसका होंसला l
कभी लहरों के ऊफान की विजय तो
कभी शांत पानी में डूबते सूरज का सौन्दर्य l
उसी तरह
मन में हर पल हरदम चलता एक संघर्ष
और मुश्किल से साँस लेती
उभरती हुई कविता की कश्मकश l
कभी कुछ शब्दों की तलाश तो
कभी लुप्त होता कविता का सार l
चाहता हूँ समेटना अगर स्वछन्द बचपन तो
दिखाई देता है हर पल अस्त होता जीवन भी l
एक ओर बुझता हुआ आस्था का दीपक तो
दूसरी ओर रोशन होती क्रांति की मशाल l
कभी झुंड में खो जाने का डर तो
कभी चोटी पर दिखाई देता अकेला खड़ा मेरा प्रतिबिम्ब l
इस कौतुहल में बनती हुई कविता ढूंढ रही है
अपना लक्ष्य
पर कविता अभी भी फंसी हुई है ...