लहरों पे चलने की कोशिश करती एक कश्ती
और दो किनारों का अंतर्द्वंद्व l
हर पल हरदम हिम्मत जुटाता अकेला माझी
कश्ती पार लगाने को
और अभिमान में जलते दो किनारों का अंतर्द्वंद्व l
कभी कश्ती को डुबाता एक किनारा तो
कभी सहारा देता दूसरे का हाथ l
एक पल ठोकरें खाता माझी तो
दूसरे पल हवा के साथ बातें करता उसका होंसला l
कभी लहरों के ऊफान की विजय तो
कभी शांत पानी में डूबते सूरज का सौन्दर्य l
उसी तरह
मन में हर पल हरदम चलता एक संघर्ष
और मुश्किल से साँस लेती
उभरती हुई कविता की कश्मकश l
कभी कुछ शब्दों की तलाश तो
कभी लुप्त होता कविता का सार l
चाहता हूँ समेटना अगर स्वछन्द बचपन तो
दिखाई देता है हर पल अस्त होता जीवन भी l
एक ओर बुझता हुआ आस्था का दीपक तो
दूसरी ओर रोशन होती क्रांति की मशाल l
कभी झुंड में खो जाने का डर तो
कभी चोटी पर दिखाई देता अकेला खड़ा मेरा प्रतिबिम्ब l
इस कौतुहल में बनती हुई कविता ढूंढ रही है
अपना लक्ष्य
पर कविता अभी भी फंसी हुई है ...
और दो किनारों का अंतर्द्वंद्व l
हर पल हरदम हिम्मत जुटाता अकेला माझी
कश्ती पार लगाने को
और अभिमान में जलते दो किनारों का अंतर्द्वंद्व l
कभी कश्ती को डुबाता एक किनारा तो
कभी सहारा देता दूसरे का हाथ l
एक पल ठोकरें खाता माझी तो
दूसरे पल हवा के साथ बातें करता उसका होंसला l
कभी लहरों के ऊफान की विजय तो
कभी शांत पानी में डूबते सूरज का सौन्दर्य l
उसी तरह
मन में हर पल हरदम चलता एक संघर्ष
और मुश्किल से साँस लेती
उभरती हुई कविता की कश्मकश l
कभी कुछ शब्दों की तलाश तो
कभी लुप्त होता कविता का सार l
चाहता हूँ समेटना अगर स्वछन्द बचपन तो
दिखाई देता है हर पल अस्त होता जीवन भी l
एक ओर बुझता हुआ आस्था का दीपक तो
दूसरी ओर रोशन होती क्रांति की मशाल l
कभी झुंड में खो जाने का डर तो
कभी चोटी पर दिखाई देता अकेला खड़ा मेरा प्रतिबिम्ब l
इस कौतुहल में बनती हुई कविता ढूंढ रही है
अपना लक्ष्य
पर कविता अभी भी फंसी हुई है ...



