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Thursday, October 28, 2010

मासूम

एक तस्वीर मिली है,
जली हुई फटी हुई सी,
लाशों के बाज़ार में,
एक हंसती हुई मासूम
सी बच्ची की,
आवाज़ दी,
चीखा भी,
चिल्लाया भी,
पर कहीं से कुछ जवाब
नहीं,
किसी की उधड़ी हुई
चमड़ी के साथ फंसी हुई
थी कबसे,
खून की मौजों में गोते
खाती हुई आ पहुंची
मेरे पैरों तक,
कुछ मॉस के टुकड़े,
कुछ खून के धब्ब्बे,
हटाये तो एक चेहरा सामने आया,
मासूम सा अनजान सा,
इस मौज से बेखबर सा,
कुछ कहना चाहती थी वोह
जैसे मुझको,
और मैं बेजुबान उसकी कशिश
से नासमझ हो रहा था,
फिर एक आह सुनाई दी
तो एक लाश की अंतिम सांस टूटी,
आस पास नज़र घुमाई तो देखा,
अपनी कोख को पीटती हुई एक माँ,
खून की चादर से मेहँदी
उतारती हुई एक दुल्हन,
अपने कुरते के कोने से चश्मा
साफ़ करता हुआ एक पिता,
और भाई की जेब में ताबीज़ रखती
हुई एक बहेन,
हर तरफ खौफनाक
बेक़सूर चेहरे,
हर तरफ वक़्त की हैवानियत
से लतपत गुर्राए हुए चेहरे,
दहाड़ रहे थे जैसे मुझपे,
कुछ देर बाद,
एक आवाज़ गूंजती हुई सुनाई दी,
देखा तो वोह मासूम सी बच्ची,
तस्वीर से कुछ बोल रही थी,
“यह सब मर चुके हैं
जाने कबसे,
यह तो बस भटकते हुए इनके
भूत हैं,
मैं अभी भी जिंदा हूँ,
हँसना चाहती हूँ,
जीना चाहती हूँ,
मुझे लेचालो यहाँ से,
और मुझे जीने दो”